src="https://alwingulla.com/88/tag.min.js" data-zone="20313" async data-cfasync="false"> राम जन्मभूमि का इतिहास | अयोध्या राम मंदिर का इतिहास |

भगवान राम का जन्म 5114 ईसा पूर्व को उत्तरप्रदेश के अयोध्या में हुआ था।आक्रमणकारो के आने के पहले यहां हिन्दू, जैन और बौद्ध धर्म के हजारो मंदिर और स्तूप थे।

मुग़ल समय के दौरान

विदेशी आक्रमणकार बाबर के आदेश पर इ.स 1527-28 में अयोध्या में राम जन्मभूमि पर बने राम मंदिर को तोड़कर एक मस्जिद का निर्माण किया गया। समयांतर में बाबर के नाम पर ही इस मस्जिद का नाम बाबरी मस्जिद रखा गया।

जब मंदिर को तोड़ा जा रहा था तब राम जन्मभूमि मंदिर पर महात्मा श्यामनंदजी महाराज का अधिकार था। उस समय भीटी के राजा महताब सिंह बद्रीनारायण ने मंदिर को बचाने के लिए बाबर की सेना से युद्ध लड़ा।
उस समय में अयोध्या से लगभग 6 मील की दूरी पर सनेथू गांव के पं. देवीदीन पांडे ने वहां के आसपास के गांवों के सूर्यवंशीय क्षत्रियों को संगठित किया और युद्ध हुआ। पं. देवीदीन पांडे सहित हजारों हिन्दू शहीद हो गए और बाबर की सेना जीत गई। पांडेजी की मृत्यु के 15 दिन बाद हंसवर के महाराज रणविजय सिंह ने सिर्फ हजारों सैनिकों के साथ मीरबाकी की विशाल और शस्त्रों से सुसज्जित सेना से रामलला को मुक्त कराने के लिए आक्रमण किया लेकिन महाराज सहित जन्मभूमि के रक्षार्थ सभी वीरगति को प्राप्त हो गए।

स्व. महाराज रणविजय सिंह की पत्नी रानी जयराज कुमारी ने अपने पति की वीरगति के बाद खुद जन्मभूमि की रक्षा के कार्य को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी ली और 3,000 नारियों की सेना लेकर उन्होंने जन्मभूमि पर आक्रमण कर दिया और हुमायूं के समय तक उन्होंने छापामार युद्ध जारी रखा।

स्वामी महेश्वरानंदजी ने संन्यासियों की सेना बनाई। रानी जयराज कुमारी हंसवर के नेतृत्व में यह युद्ध चलता रहा। लेकिन हुमायूं की सेना से इस युद्ध में स्वामी महेश्वरानंद और रानी जयराज कुमारी लड़ते हुए अपनी बची हुई सेना के साथ शहीद हो गई और जन्मभूमि पर फिर से मुगलों का अधिकार हो गया।

अकबर के समय में सेना हर दिन के इन युद्धों से कमजोर हो रही थी और अकबर ने बीरबल और टोडरमल के कहने पर खस की टाट से उस चबूतरे पर 3 फीट का एक छोटा-सा मंदिर बनवा दिया। अकबर की इस कूटनीति से कुछ दिनों के लिए जन्मभूमि में कोई भी युद्ध नहीं हुआ और रक्त नहीं बहा।

फिर औरंगजेब के समय में भयंकर दमनचक्र चलाकर उत्तर भारत से हिन्दुओं के संपूर्ण सफाए का निर्णय लिया गया। लगभग औरंगजेब 10 बार अयोध्या में मंदिरों को तोड़ने का अभियान चलाकर यहां के सभी मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ दिया । औरंगजेब के समय में गुरु श्रीरामदासजी महाराज के शिष्य श्रीवैष्णवदासजी ने जन्मभूमि को मुक्त कराने के लिए 30 बार आक्रमण किए।

नासिरुद्दीन हैदर के समय में मकरही के राजा के नेतृत्व में जन्मभूमि को पुन: अपने रूप में लाने के लिए हिन्दुओं के 3 आक्रमण हुए जिसमें बड़ी संख्या में हिन्दू शहीद गए। इस युद्ध में कई प्रान्त के राजा गुरुदत्त सिंह आदि सम्मिलित थे। हारती हुई हिन्दू सेना के साथ वीर चिमटाधारी साधुओं की सेना आ मिली और इस युद्ध में मुगल सेना को हारना पड़ा और राम जन्मभूमि पर पुन: हिन्दुओं का कब्जा हो गया। लेकिन कुछ दिनों के बाद सेना ने पुन: जन्मभूमि पर अधिकार कर लिया और हजारों रामभक्तों भक्तो को मार डाला |

नवाब वाजिद अली शाह के समय में पुन: हिन्दुओं ने जन्मभूमि को बचाने के लिए आक्रमण किया गया। इतिहासकार कनिंघम लिखते है कि ये अयोध्या का सबसे बड़ा हिन्दू-मुस्लिम बलवा था।

1853 में हिन्दुओं का आरोप था कि भगवान राम के मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण हुआ। इस मुद्दे पर हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच पहली हिंसा हुई।

. इसके बाद 1857 के संग्राम में बहादुरशाह जफर के समय में बाबा रामचरण दास ने मौलवी आमिर अली के साथ जन्मभूमि के उद्धार का प्रयास किया। कुछ कट्टरपंथी मुस्लिमों को यह बात स्वीकार नहीं हुई और उनके विरोध के चलते 18 मार्च 1858 दोनों को एकसाथ अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया।

विवाद के चलते 1859 में ब्रिटिश शासकों ने विवादित स्थल पर बाड़ लगा दी और परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों को और बाहरी हिस्से में हिन्दुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दे दी।

19 जनवरी 1885 को हिन्दू महंत रघुबीर दास ने पहली बार इस मामले को फैजाबाद के न्यायाधीश पं. हरिकिशन के सामने रखा था। इस मामले में कहा गया था कि मस्जिद की जगह पर मंदिर बनवाना चाहिए, क्योंकि वह स्थान प्रभु श्रीराम का जन्म स्थान है।

आज़ादी के बाद

1947 में भारत सरकार ने मुसलमानों को विवादित स्थल से दूर रहने के आदेश दिए और मस्जिद के मुख्य द्वार पर ताला लगा दिया गया जबकि हिन्दू श्रद्धालुओं को एक अलग जगह से प्रवेश दिया जाता रहा।

1949 में भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गईं। मुसलमानों ने इस पर विरोध व्यक्त किया और दोनों पक्षों ने अदालत में मुकदमा दायर कर दिया। सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित करके ताला लगा दिया।

1984 में कुछ हिन्दुओं ने विश्व हिन्दू परिषद के नेतृत्व में भगवान राम के जन्मस्थल को ‘मुक्त’ करने और वहां राम मंदिर का निर्माण करने के लिए एक समिति का गठन किया। बाद में इस अभियान का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संभाल लिया

1986 में जिला मजिस्ट्रेट ने हिन्दुओं को प्रार्थना करने के लिए विवादित मस्जिद के दरवाजे पर से ताला खोलने का आदेश दिया। मुसलमानों ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन किया।

1989 में विश्व हिन्दू परिषद ने राम मंदिर निर्माण के लिए अभियान तेज किया और जो विवादित स्थल के नजदीक राम मंदिर की नींव रखी। इसी वर्ष प्रयागराज (इलहाबाद) उच्च न्यायलय ने आदेश दिया कि विवादित स्थल के मुख्य द्वारों को खोल देना चाहिए और इस जगह को हमेशा के लिए हिन्दुओं को दे देना चाहिए।

30 अक्टूबर 1990 को रामभक्तों ने मुख्यमंत्री मुलायमसिंह यादव द्वारा खड़ी की गईं अनेक बाधाओं को पार कर अयोध्या में प्रवेश किया और विवादित ढांचे के ऊपर भगवा ध्वज लहेरा दिया,और 2 नवंबर 1990 को मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया जिसमें सैकड़ों रामभक्तों की जान चली गइ | सरयूनदी के तट पर रामभक्तों की लाशों से भर गया था। इस हत्याकांड के बाद अप्रैल 1991 को उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायमसिंह यादव को इस्तीफा देना पड़ा।

. इसके बाद लाखों रामभक्त 6 दिसंबर को कारसेवा हेतु अयोध्या पहुंचे। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी ढांचा गिरा दिया गया जिसके परिणामस्वरूप देशभर में दंगे हुए। इसी मसले पर विश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंघल, भाजपा नेता आडवाणी, यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, मुरली मनोहर जोशी और मध्यप्रदेश की पूर्व सीएम उमा भारती सहित 13 नेताओं के खिलाफ आपराधिक साजिश का मुकदमा चलाने की मांग की गई थी।

6 दिसंबर 1992 को जब विवादित ढांचा गिराया गया, उस समय राज्य में कल्याण सिंह की सरकार थी। उस दिन सुबह करीब 10.30 बजे हजारों-लाखों की संख्या में कारसेवक पहुंचने लगे। दोपहर में 12 बजे के करीब कारसेवकों का एक बड़ा जत्था मस्जिद की दीवार पर चढ़ने लगता है। लाखों की भीड़ को संभालना सभी के लिए मुश्किल हो गया। दोपहर के 3 बजकर 40 मिनट पर पहला गुंबद भीड़ ने तोड़ दिया और फिर 5 बजने में जब 5 मिनट का वक्त बाकी था तब तक पूरे का पूरा विवादित ढांचा गिर चुका था। भीड़ ने उसी जगह पूजा-अर्चना की और ‘राम शिला’ की स्थापना कर दी। पुलिस के बड़े अधिकारी मामले की गंभीरता को समझ रहे थे। गुंबद के आसपास मौजूद कारसेवकों को रोकने की हिम्मत किसी में नहीं थी। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का साफ आदेश था कि कारसेवकों पर गोली नहीं चलेगी।

1527-28 ईसवी में बाबर के सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर को तोड़ा था जिसका पंडित देवीदीन पांडे के नेतृत्व में युद्ध के रूप में पहला विरोध किया गया था। तब से लेकर आज तक 77 से अधिक युद्ध और सैकड़ों दंगे हो चुके हैं जिसमें लाखों कारसेवकों की जानें चली गईं। इस पवित्र स्थल हेतु श्री गुरु गोविंदसिंहजी महाराज, महारानी राज कुंवर तथा अन्य कई विभूतियों ने भी संघर्ष किया।6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई। परिणामस्वरूप देशव्यापी दंगों में करीब दो हजार लोगों की जानें गईं। उसके दस दिन बाद 16 दिसम्बर 1992 को लिब्रहान आयोग गठित किया गया। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश एम.एस. लिब्रहान को आयोग का अध्यक्ष बनाया गया।
लिब्रहान आयोग को 16 मार्च 1993 को यानि तीन महीने में रिपोर्ट देने को कहा गया था, लेकिन आयोग ने रिपोर्ट देने में 17 साल लगाए।
30 जून 2009 को लिब्रहान आयोग ने चार भागों में 700 पन्नों की रिपोर्ट प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और गृह मंत्री पी. चिदम्बरम को सौंपा।
जांच आयोग का कार्यकाल 48 बार बढ़ाया गया।
31 मार्च 2009 को समाप्त हुए लिब्रहान आयोग का कार्यकाल को अंतिम बार तीन महीने यानी 30 जून तक के लिए बढ़ा गया। पिछले 17 सालों में इस रिपोर्ट पर लगभग 8 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं।
आयोग से जुड़े एक सीनियर वकील अनुपम गुप्ता के अनुसार 700 पन्नों के इस रिपोर्ट में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व भाजपा नेता कल्याण सिंह के नाम का उल्लेख 400 पन्नों में है, जबकि लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की चर्चा 200 पन्नों पर की गई है। हालांकि अध्यक्ष से मतभेद के कारण अनुपम गुप्ता इस जांच से अलग हो गए थे।

संदर्भ : प्राचीन भारत, लखनऊ गजेटियर, लाट राजस्थान, रामजन्मभूमि का इतिहास (आरजी पाण्डेय), अयोध्या का इतिहास (लाला सीताराम), बाबरनामा आदि स्रोतों से संकलित।


 
 
 
 
 

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